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MP Election 2023: जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध – MP Election 2023 Time will write crimes of those who are neutral

एमपी इलेक्शन 2023: अपने समर्थकों को लेकर मतदान के बहिष्कार की घोषणा लोकतंत्र के समर्थकों की।

द्वारा प्रशांत पांडे

प्रकाशित तिथि: मंगलवार, 31 अक्टूबर 2023 11:44 पूर्वाह्न (IST)

अद्यतन दिनांक: मंगलवार, 31 अक्टूबर 2023 11:52 पूर्वाह्न (IST)

MP चुनाव 2023: जो तटस्थ हैं वे समय लिखेंगे उनका भी अपराध
नोट यानी इनमें से कोई नहीं का विकल्प विपरीत उपयोगकर्ताओं की संख्या भी कम नहीं है।

पर प्रकाश डाला गया

  1. नोटा एक विकल्प अवश्य है लेकिन समाधान नहीं।
  2. नोटा में पढ़े लैपटॉप की गणना तो होगी लेकिन वह किसी काम का नहीं होगा।
  3. चौक-चौराहों पर वे झंडे लगा रहे हैं कि सड़क या पानी नहीं तो वोट नहीं।

एमपी चुनाव 2023: संजय मिश्र। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस सत्ता में आने के लिए जोर लगा रही हैं। अहिंसा को बढ़ावा देने के लिए दोनों विचारधाराओं के समर्थकों ने जोर-शोर से अपनी पकड़ बना ली है, लेकिन कुछ क्षेत्रीय-कस्बों में ऐसे नागरिक भी हैं जो अपनी राय या राय को लेकर मतदान के बहिष्कार की घोषणा कर रहे हैं।

चौक-चौराहों पर वे झंडे लगा रहे हैं कि सड़क या पानी नहीं तो वोट नहीं। सवाल यह है कि वोटिंग न करके वे किसका बहिष्कार करेंगे? “नोटा अर्थात इनसे कोई नहीं” का विकल्प विपरीत उपयोगकर्ताओं की संख्या भी कम नहीं है। उनका तर्क है कि अंतिम राजनीतिक व्यवस्था में ऐसा कोई दल या दावेदार नहीं होता, जिसे वे अपना मत दें। इसी तर्क के आधार पर वे उस नोटा का उपयोग करते हैं जो न सरकार चुने और न चुने।

नोटा में पढ़े लैपटॉप की गणना तो होगी लेकिन वह किसी काम का नहीं होगा। इसलिए जरूरत है कि मत दीजिए समय पक्ष या नागरिकता धारकों के अधिकार के बारे में जरूर सोचा जाए। चुनाव आयोग सामने यह भी चुनौती है कि नोटा को पसंद करने वाले लैपटॉप को किस तरह से मुख्यधारा में लाया जाए। केवल जीत के लिए चुनाव नहीं होता, इसलिए नोटा से अच्छा है कि नाखुश लोग अपना उम्मीदवार खड़ा करके अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर सकते हैं।

एक दशक पूर्व गैर सरकारी संगठन पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) ने सर्वोच्च न्यायालय में इस तरह की व्यवस्था देने की मांग की थी, जिसमें किसी की भी सहमति न होने वाले लोग भी वोट कर सहायक थे। लम्बी सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को मतपत्र-ईवीएम में इसके लिए प्रचार-प्रसार करने के निर्देश दिए।

इसके बाद चुनाव आयोग ने 2013 में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में नोटा का विकल्प विकल्प का निर्णय लिया। आयोग का मानना ​​था कि नोटा के जरिए ऐसे लोगों की आस्था लोकतंत्र में बनाया जा सकता है, जो सरकार या उम्मीदवार से स्वीकृति का प्रस्ताव रखा मतदान नहीं किया जाएगा। जोसेफ में यह विकल्प मीटिंग के बाद ऐसे भी मतदेय स्थल तक जाने लगे जो किसी एक प्रतियोगी को मत देने में खुद को अधूरा महसूस कर रहे थे।

वास्तव में यह एक लोकतांत्रिक व्यवस्था है लेकिन जब कुछ लोगों के लिए यह अप्रसन्नता वार्ता करना अनिवार्य माध्यम बन जाए तो इस पर विचार करना जरूरी है। नोटा में डाले गए मोटरसाइकिल की कोई कीमत नहीं है। यदि किसी क्षेत्र के मुख्य मत भी नोटा में दिए गए विवरण को देखें तो कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला।

2018 के चुनाव नतीजों पर नजर डालें तो देखिए मध्य प्रदेश के 11 हिस्सों में ऐसी जगहें जहां बीजेपी समर्थकों के हार के पीछे नोटा में पड़े टॉयलेट को बड़ा कारण माना गया है लेकिन असल में यह एक विचार भर है। यह कठिन लगता है कि 11 पदों पर जिन लोगों ने नोटा का विकल्प चुना वे भाजपा को ही झटका देते थे। उन्होंने तो उस सीट से उम्मीदवारी के दावेदार को भी चुनौती दी थी। उस चुनाव में कुल पढ़े लैपटॉप से ​​1.42 प्रतिशत मत नोटा को मिले थे।

इन दस्तावेजों की संख्या 5,40,673 थी। इसी तरह 2019 के आम चुनाव में भी 3,40,984 मत नोटा को मिले थे। यह कुल मतदान का .66 पद था। विधानसभा चुनाव में भाजपा के जो उम्मीदवार कम टैटू से हारे थे, वे दमोह से पूर्व वित्त मंत्री जयन्त मलैया की खूब चर्चा हुई।

वह 798 मोटोरोला के अंतर से हार गए थे जबकि नोटा में इससे काफी अधिक मत डाले गए थे। इस तरह के कई उदाहरण रहे. हार्नेस वाले दावेदार अपनी तसल्ली के लिए यह तर्क पेश करते हैं कि अगर नोटा में मत पड़े होते तो वह जीत जाते लेकिन शायद यह एक तर्क है, वास्तविकता नहीं।

  • लेखक के बारे में

    नईदुनिया डॉट कॉम इंदौर में मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ डेस्क पर वरिष्ठ उप-संपादक। पत्रकारिता और जनसंचार में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर से बैचलर और विक्रम विश्वविद्यालय, मसा से मास्टर्स डिग्री। इंदौर 2014


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