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श्रीलंका को मजबूत राजनीतिक नेतृत्व ही दिला सकता है वर्तमान संकट से निजात – Only strong political leadership can get Sri Lanka out of Current crisis

अब राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कोई भी बने, उसके लिए देश को इस सैद्धांतिक आर्थिक संकट से उबरना आसान नहीं होगा।

द्वारा नवोदित शक्तावत

प्रकाशित तिथि: मंगलवार, 12 जुलाई 2022 06:03 अपराह्न (IST)

अद्यतन दिनांक: मंगलवार, 12 जुलाई 2022 06:05 अपराह्न (IST)

श्रीलंका को मजबूत राजनीतिक नेतृत्व ही वर्तमान संकट से जूझ सकता है

कृष्णमोहन झा

भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका में राष्ट्रपति गोतबाया के खिलाफ जनता ने पिछले दिन इतना सिद्धांत ले लिया कि राष्ट्रपति ने अपने महल को नष्ट कर दिया और महल में घुस कर सारे महल पर कब्ज़ा कर लिया और उनका सारा सामान तहस-नहस कर दिया। नहस कर दिया। विश्वास है कि दो महा पूर्व राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे के बड़े भाई और प्रधानमंत्री महिन्द्रा राजपक्षे भी जनता के मित्र थे, क्योंकि उनके आवास से भाग लिया गया था और उन्हें जनता की मांग पर अपने पद से इस्तीफा देने के लिए नियुक्त किया गया था। जनता की पसंद को देखते हुए गोतबाया राजपाखे ने अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा की है। वास्तविक जनता के घर से भागने के लिए जब तक कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता, तब तक दोनों भाई अपने-अपने पद से हटने के लिए तैयार हो जाते हैं, अन्यथा वे कुरसी से संतृप्त रहने में कोई भी आर्द्र नहीं करते।

पूर्वी श्रीलंका आज जिस भयंकर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है, उसकी शुरुआत तब हुई थी जब महिन्द्रा राजपक्षे प्रधान मंत्री और उनके छोटे भाई गोतबया राजपक्षे राष्ट्रपति पद पर आसीन हुए थे, इसलिए वहां की जनता इस आर्थिक संकट के सहयोगियों को जिम्मेदार मान रही है ।। ऐसा माना जा रहा है कि श्रीलंका में इस समय जिस प्रकार की भीषण चट्टानें और जीवनोपयोगी वस्तुओं की अपरिपक्व अभाव की स्थिति बनी हुई है, वहां की जनता का जीवन दुभर कर दिया गया है, उस पर अध्यात्म प्राप्ति के लिए सत्यसीन राजपक्षे बंधुओं ने समय रहते कोई प्रभावशाली कदम नहीं उठाया है। तबाया राजपक्षे जब राष्ट्रपति बने रहे तो उन्होंने जनता की भलाई के कदम उठाने के बजाय भाई भतीजावाद को प्रश्रय देने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और सत्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उनके विरोधी देश में शांति का मोटरबाइक बना हुआ है लेकिन वे अनदेखी कर रहे हैं। शायद उन्होंने अपने मन में यह भ्रम पाल लिया था कि कोई भी अपने बाल भी बाँका नहीं कर सकता। राजपक्षे बंधुओं ने सत्य के हित में इस तरह का आरोप लगाया था कि उन्हें सरकार की गलत सामुदायिकता के कारण जनता के बढ़ते असंतोष का पता ही नहीं चला और जब उन्हें जनता के प्रति आश्वस्त किया गया तब तक पानी सर के ऊपर जा चुका था।

राजपक्षे सरकार की गलत आर्थिक नीतियों के कारण श्रीलंका में अब ऐसी विकट स्थिति पैदा हो गई है कि अब वहां राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कोई भी बने, उनके देश के लिए इस सैद्धांतिक आर्थिक संकट से उबरना आसान नहीं होगा। जब तक अन्य देशों से श्रीलंका को बड़ी आर्थिक मदद नहीं मिलती तब तक वर्तमान आर्थिक संकट से राहत के लिए कोई भी निवेशक नहीं हो सकता है और बड़ी विदेशी मदद पाने के लिए इस समय तक अन्य देशों से श्रीलंका में राजनीतिक संकट से जूझना निकट भविष्य में बहुत जरूरी है। अनुमान नजर नहीं आ रही है.

प्रधानमंत्री पद से महिंद्रा राजपक्षे के डिग्री के बाद उनकी कुर्सी पर बैठने वाले विक्रमसिंघे भी श्रीलंकाई जनता का कोपभजन बनने से नहीं बचे हैं और वे भी प्रधानमंत्री पद से अपनी कुर्सी पर बैठने का शौक कर चुके हैं। मित्र हैं कि क्रुद्ध डेमोक्रेट ने कल श्रीलंका के राष्ट्रपति भवन पर कब्ज़ा करने के साथ ही प्रधानमंत्री विक्रसिंघे के निजी आवास को भी आग के हवाले कर दिया था। कुल मिलाकर श्रीलंका में आज जो राजनीतिक विषमताएं बनी हैं उनमें जल्द ही राजनीतिक स्थिरता का दौर आने की उम्मीद है जिसमें बेमानी स्थिति हो रही है। इस समय श्रीलंका में केवल आर्थिक संकट नहीं है, बल्कि राजनीतिक समन्वय के कारण भी संकट उत्पन्न हो गया है।

संविधान के राष्ट्रपति का पद पूर्ण होने से पहले ही यदि वह पद रिक्त होता है तो उसके अनुसार ही किसी सदस्य को राष्ट्रपति चुना जा सकता है और तब तक प्रधानमंत्री ही राष्ट्रपति की जिम्मेदारी संभालता है। वर्तमान प्रधानमंत्री विक्रम सिंघे ने जो अचल संपत्ति छोड़ी उसकी वजह से वहां कॉम्प्लेक्स संवैधानिक संकट की स्थिति बन गई है। राष्ट्र पति पद से गोतबाया राजपक्षे के शस्त्रागार पर संसद को एक के अंदर न एक राष्ट्रपति के चयन की प्रक्रिया शुरू करनी होगी और राष्ट्रपति का नया राष्ट्रपति बनना तब तक होगा जब तक वहां यह जिम्मेदारी नहीं रहेगी, यह जिम्मेदारी कौन संभालेगा यह अगले कुछ दिनों में स्पष्ट हो जाएगा जब विक्रमसिंघे के स्थान पर पर कोई नया प्रधानमंत्री बनेगा।

संयुक्त राष्ट्र के पड़ोसी देश के रिश्तेदार भारत में उनकी मदद की जा रही है ताकि वहां की जनता को असुविधा हो और अलगाव न हो। पिछले 6 महीनों के दौरान श्रीलंका ने अपने आर्थिक संकट से उबरने के लिए भारत को लगभग पांच अरब डॉलर की मदद पहुंचाई है और आगे भी भारत उसकी मदद के लिए तैयार है, लेकिन वहां राजनीतिक समझौते के कारण भारत इतनी जल्दी कोई निर्णय नहीं ले सका है। ले सकते हैं। श्रीलंका के प्रधानमंत्री विक्रम सिंघे ने भारत से लगभग अरब डॉलर की और मदद की पेशकश की थी।

इसके अलावा इंजील ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से भी मदद की उम्मीद जताई है। भारत अब यह उम्मीद कर रहा है कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष श्रीलंका को अनुदान कराता है। इसी के आधार पर भारत भी फैसला चाहता है, लेकिन इतना तो तय है कि आम नागरिकों की मुश्किलों को अपनी दिशा में कम करने के लिए अपनी ओर से हर संभव मदद करने से भारत पीछे नहीं हटेगा। भारत के पैनी श्रीलंका में चीन की सबसे बड़ी आबादी भी है जो इस असंतुलित आर्थिक संकट में अपने हित साधनों की कोशिश करने से असफल नहीं होगी।

श्रीलंका इस समय अपने इतिहास में जिस प्रतिकूल आर्थिक संकट का सामना कर रहा है, उसके कई कारण हैं, लेकिन मुख्य कारण तो सरकार के मनमाने गलत आर्थिक फैसले हैं, जहां सरकार और जनता के बीच दूरियां तेजी से बढ़ी हैं। जनता की सरकार से जो मोहभंग हुआ, उसे भांपने में सरकार से असफलता मिली। सत्यसीन राजपक्षे बंधुओं द्वारा भाई भतीजावाद को प्रश्रय देना जनता को पसंद नहीं आया। इस भतीजावाद के कारण कमजोरी को पठने का भी भरपूर मौका मिला।

जो महिन्द्रा राजपक्षे अपने देश में लिट्टे के आक्रमण पर विजय प्राप्त करने के बाद देश में नायक बनकर उभरे थे, उनकी जनता से यह यशराह मोहभंग हुआ था कि उन्हें आंदोलनकारी आतंकवादियों ने प्रधानमंत्री आवास के लिए टिकट और अपनी कुर्सी छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया था। उन्होंने अपने पक्ष में स्थिति को खराब करने का प्रयास किया लेकिन उनका यह चरण प्रमाणित हो गया।

इस समय जो भी विदेशी मुद्रा का भंडार है, वह श्रीलंका के पास नहीं है। इस कमी के कारण जले पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इंडोनेशिया का एक प्रमुख स्रोत पर्यटन उद्योग है लेकिन कोरोना संकट ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया है। श्रीलंका के उत्पादन में भी बेहद गिरावट आई है। पेट्रोल, डीजल, दवाइयाँ, खाने की वस्तुएं शामिल हैं जिनमें व्यापारियों के उपयोग की जरूरतों को पूरा करने के लिए व्यावसायिक बिक्री के बाहर लंबी लंबी कतारें लग रही हैं।

बिजली की कमी लगातार बनी हुई है। कुल मिलाकर स्थिति इतनी जटिल हो गई है कि श्रीलंका अब अपने इतिहास के सबसे सैद्धांतिक आर्थिक संकट का सामना करने में असमर्थ हो गया है और सिद्धांतों से मदद की आस तब तक पूरी तरह से मुश्किल है जब तक कोई नहीं मजबूत राजनीतिक नेतृत्व उभरकर सामने नहीं आता। ऐसे समय में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

  • लेखक के बारे में

    वर्तमान में नईदुनिया डॉट कॉम में शेयरधारक हैं। पत्रकारिता में अलग-अलग नामांकन में 21 साल का दीर्घ अनुभव। वर्ष 2002 से प्रिंट और डिजिटल में कई बड़े दिन सिद्धांत


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