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वृद्धजनों का मान-सम्मान करें, इस अवस्‍था में चाहिये बहुत देखभाल – Give respect to Elderly People in this condition a lot of care is needed

देश में वृद्धजनों की एक बड़ी संख्या है। राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार देश की कुल जनसंख्या में वृद्धजनों की भागीदारी वर्ष 2011 में लगभग 9 प्रतिशत थी। वर्ष 2036 तक यह संख्या 18 प्रतिशत होने का अनुमान है।

द्वारा नवोदित शक्तावत

प्रकाशित तिथि: शनिवार, 01 अक्टूबर 2022 04:31 अपराह्न (IST)

अद्यतन दिनांक: शनिवार, 01 अक्टूबर 2022 04:32 अपराह्न (IST)

वृद्धजनों का मान-सम्मान करें, इस अवास्था में प्रयोगशाला बहुत देखभाल

-डॉ. बोरिंग

जीवन के कई चक्र हैं, जैसे बाल्यकाल, यौवनकाल, पौरूधकाल और वृद्धकाल। वृद्धावस्था में मानव आदर्श हो जाते हैं। उनका शारीरिक बल कम हो जाता है, सुनने एवं देखने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। इस राज्य में मनुष्य का मस्तिष्क भी प्रभावित होता है। उनकी स्मरण शक्ति क्षीण होती रहती है। वह बातें भूलने लगती है। वह वस्तु बेचना भूल जाता है। वही समय कही गई बात भी उसे याद नहीं रहती। ऐसे समय में वृद्धजनों को अपने परिवार की बहुत आवश्यकता होती है। उन्हें विशेष देखभाल की आवश्यकता है। उन्हें अपने परिवार के लोगों के प्रेम की आवश्यकता होती है। अगर ऐसे समय में वे अपने परिवार के लोगों के साथ न मिलें तो वे टूट जाते हैं। उनका वाइल्ड कम हो जाता है।

दुर्भाग्य से यदि उन्हें अपने परिवार के लोगों के द्वारा स्मारक बनाया जाए, तो उनका जीवन नारकीय बन कर रह जाता है। उत्तर प्रदेश के नासिक के रकाबगंज के रहने वाले 82 वर्ष के विश्वनाथ प्रसाद हाथों वाले यूरिन का बाग लेकर इधर-उधर भटक रहे हैं। उनकी दो युवा पुत्रियाँ और चार पुत्रियाँ हैं। बुरा उनका कोई भी संत उनकी देखभाल नहीं करना चाहता है। उनकी नवीनतम स्थिति देखकर वन स्टॉप सेंटर ने सरोजोन्नयन संस्थान स्थित एमेनी नगर स्थित है। देश में जिस तरह से हजारों बूढ़े हैं, वैसे ही रामास्वामी प्रसाद, जो परिवार के साथ होते हैं, वे भी शहीद हैं।

देश में वृद्धजनों की एक बड़ी संख्या है। राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार देश की कुल जनसंख्या में वृद्धजनों की भागीदारी वर्ष 2011 में लगभग 9 प्रतिशत थी। वर्ष 2036 तक यह संख्या 18 प्रतिशत होने का अनुमान है। देश की 8.4 प्रतिशत यानि 10.2 करोड़ जनसंख्या की आयु 60 वर्ष से अधिक है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2061 तक भारत में वृद्धजनों की संख्या 42.5 करोड़ होगी। संयुक्त राष्ट्र की ही रिपोर्ट के अनुसार भारत में वृद्धजनों की संख्या वर्ष 2050 तक लगभग 20 प्रतिशत होने का अनुमान है। वर्तमान में यह दर 8 प्रतिशत है। वर्ष 2050 तक वृद्धजनों की संख्या में 326 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान है, जबकि 80 वर्ष एवं उससे अधिक आयु के लोगों की संख्या में 700 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान है।

जिस प्रकार के देशों में वृद्धजनों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है, उनकी दृष्टि में वृद्धजनों की स्थिति और भी नामांकित हो सकती है। ये संतोष की बात है कि देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति दिन-प्रतिदिन उत्तम होने के कारण लोगों के जीवन प्रत्याशा में वृद्धि हुई है। वर्तमान समय में जीवन प्रत्याशा स्वतंत्रता की तुलना समय से अधिक हो गयी है। वर्ष 1940 वर्ष के दशक के अंत में जीवन प्रत्याशा लगभग 32 वर्ष था, जो अब 70 वर्ष हो गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं की उम्र ज्यादा लंबी होगी। वर्ष 2011 में यह 69.4 वर्ष था, जो वर्ष 2061 में उछाल 79.7 वर्ष होगा। पुरुषों में वर्ष 2011 में औसत आयु 66 वर्ष थी, जो 2061 में 76.1 वर्ष होगी। बुरा दुःख का विषय यह है कि वृद्धजनों की संख्या के साथ-साथ उनके होने वाले खतरे के मामलों में वृद्धि का खतरा है।

देश में बुजुर्गों पर अत्याचार के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, सभ्य समाज के मस्तक पर कलंक हैं। वृद्ध हत्या, हत्या का प्रयास, गंभीर आश्रम, सचिवालय, डकैती, लूट एवं बंदी अवशेष जैसे गंभीर अपराधों का शिकार हो रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की वर्ष 2021 की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में बुजुर्गों पर अत्याचार के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। बुजुर्गों के प्रति बिगड़ैल संकट महाराष्ट्र में प्रथम स्थान पर है। इस मामले में मध्य प्रदेश द्वितीय एवं तेलंगाना तीसरे स्थान पर है।

दुख और लज्जा की बात है कि देश में कोरोना काल में लॉकडाउन में बुजुर्गों के साथ-साथ लॉकडाउन में भारी वृद्धि हुई। एजवेल फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित वैज्ञानिक सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 82 प्रतिशत बुजुर्गों का कहना था कि कोरोना के कारण उनका जीवन प्रभावित हुआ है। इनमें से 73 प्रतिशत बुजुर्गों को अपने जीवन में अनदेखा का सामना करना पड़ रहा है, जबकि 65 प्रतिशत बुजुर्गों को अपने जीवन में अनदेखी का सामना करना पड़ रहा है। 58 प्रतिशत वृद्धजनों का कहना था कि वे अपने परिवार एवं समाज में साहस का शिकार हो रहे हैं। लगभग 35.1 प्रतिशत वृद्धजनों का कहना था कि वृद्धावस्था में लोग घरेलू हिंसा का सामना करते हैं। इन्हें मस्कारा एवं शारीरिक रूप से अस्थि-पंजर बनाया जाता है।

देश में वृद्धजनों को स्वास्थ्य की स्थिति भी नहीं बताई गई है। सिद्धार्थ के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1995 में ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे अधिक वृद्धजनों की मृत्यु के तीन बड़े कारण श्वास संबंधी रोग, हृदयघात एवं लकवा रहे हैं। इन श्वास संबंधी विकारों के कारण 25.8 प्रतिशत लोगों की मृत्यु हुई, जबकि हृदय हृदय से 3.2 प्रतिशत और लकवा के कारण 8.5 प्रतिशत लोगों की मृत्यु हुई। परिवार के लोगों द्वारा साझा किए जाने के कारण वृद्धजन मानसिक तनाव की चपेट में आ जाते हैं। संस्थागत में 10 प्रतिशत से अधिक वृद्ध अवसादग्रस्त हैं। स्थिति यह है कि लगभग 50 प्रतिशत वृद्धजनों को मनोचिकित्सीय या मनोवैज्ञानिक की आवश्यकता होती है।

अब से करीब दो दशक पहले की बात है, तो तब भी बुजुर्गों की बात नहीं की गई थी। 52वें नेशनल सैम्पल सर्वे-1995-96 की एक रिपोर्ट के अनुसार बुजुर्गों में असाध्य रोग पाया गया। ग्रामीण क्षेत्र 25 प्रतिशत वृद्धजन जोड़ों की समस्या से सबसे अधिक पीड़ित थे। ग्रामीण क्षेत्रों में 38 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 43 प्रतिशत वृद्धजनों को जोड़ों से संबंधित कोई समस्या नहीं थी। ग्रामीण इलाकों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं को जोड़ों की समस्या अधिक थी। शहरी क्षेत्र में पुरुषों की तुलना में महिलाओं में जोड़ों की समस्या, उच्च व कम रक्तचाप और कैंसर आदि रोग अधिक पाए गए। इसके दिन खांसी से वृद्ध जन पीड़ित मिले। ग्रामीण क्षेत्रों में 40 प्रतिशत एवं शहरी क्षेत्रों में 35 प्रतिशत वृद्धजन किसी न किसी प्रकार की शारीरिक अक्षमता से पीड़ित पाए गए।

देश के अधिकांश बुजुर्गों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। उन्हें अपनी-अपनी आवश्यकताओं के अनुसार अपने-अपने परिवार के लोगों पर निर्भर होना चाहिए। ‘हेल्पेज इंडिया’ नामक स्वयंसेवी संस्था द्वारा आयोजित एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 47 प्रतिशत वृद्धजन आय के लिए अपने परिवार के लोगों को पात्र मानते हैं, जबकि अन्य 34 प्रतिशत पेंशन एवं सरकारी आरक्षण पर पात्र हैं। सर्वेक्षण में शामिल 40 प्रतिशत लोगों ने कहा था कि जब तक वह संभव हो सके काम करना चाहते हैं, तब तक उनका परीक्षण करें और किसी के सामने हाथ न फैलाएं।

वास्तव में वृद्धावस्था में लोगों को अपनी निजी आवश्यकताओं के लिए अपने बच्चों से लेकर पेंशनभोगी तक की आवश्यकता होती है। ऐसे बहुत से लोग भी होते हैं, जो अपने बुजुर्ग माता-पिता को पैसे नहीं देते। ऐसी स्थिति में वृद्धजन डॉक्टरों से मूल्यवर्ग हो जाते हैं। ऐसे वृद्ध नागरिकों के लिए राज्य सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश पेंशन योजना जारी की गई है। इस योजना के तहत राज्य के वृद्ध नागरिकों को 500 रुपये प्रति माह दिए जाते हैं। यह सीधे-साधे ऑनलाइन के बैंक में जमा की जाती है। इस योजना का उद्देश्य राज्य के वृद्ध नागरिकों को पेंशन का लाभ प्रदान करना है, जिससे वृद्धावस्था में उन्हें किसी भी तरह की छूट नहीं दी जाएगी। देश के अन्य राज्यों में भी इसी प्रकार की वृद्ध पेंशन चल रही हैं।

केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के माध्यम से वृद्ध नागरिकों के कल्याण के लिए कई योजनाएं बनाई जा रही हैं। गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना के अंतर्गत देश में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवार के 60 वर्ष या उससे अधिक आयु वाले वृद्धजनों को सरकार द्वारा पेंशन के रूप में आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। जिन वृद्धजनों की आयु 60 वर्ष से 79 वर्ष अधिक है उन्हें सरकार द्वारा प्रतिमान 500 रुपये की पेशकश की जाती है तथा आयु 80 वर्ष से अधिक है उन्हें प्रतिमान 800 रुपये की पेशकश की जाती है।

सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा बुजुर्ग लोगों के लिए कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इसके अंतर्गत बौद्ध आश्रम, शिशु सदन आश्रम, वृद्धजनों और विधवाओं के लिए संचालित चिकित्सा इकाइयों आदि के लिए अनुदान प्रदान किया जाता है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य वृद्धजनों की जीवन शैली में सुधार करना, उन्हें आश्रय, भोजन, चिकित्सा देखभाल और मनोरंजन जैसे सहायक अवसर प्रदान करना है।

इसी प्रकार स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने वृद्धजनों की देखभाल के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम योजना जारी की है। इसका उद्देश्य जिला, व्यावसायिक स्वास्थ्य पोर्टफोलियो एवं प्राथमिक चिकित्सा पोर्टफोलियो के माध्यम से बुजुर्गों को स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत उपलब्ध कराए जाने वाली स्वास्थ्य सुविधाएं या तो नि: शुल्क या अनुदान वाली हैं। इसी प्रकार सरकार वृद्धजनों के कल्याण के लिए कई योजनाएं चला रही है, अन्य वृद्धजनों को भी लाभ प्राप्त हो रहा है।

दो मत नहीं कि हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति एक गौरवशाली संस्कृति रही है, हमारी संस्कृति में परिवार के लोगों, वृद्धजनों को बहुत आदर एवं सम्मान दिया जाता है। हमारे देश में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है जब लोगों ने अपने परिवार के लिए अपनी सभी अभिलाषाएँ साझा कीं। लेकिन आज क्या हो रहा है? लोग धन के पीछे भाग रहे हैं। जिन माता-पिता ने अपने बच्चों का पालन-पोषण किया, वे अब उन्हें गोद में लेने लगे हैं। वे अपने वृद्ध माता-पिता को वृद्ध आश्रम में डाल रहे हैं। वृद्धावस्था में वृद्धजनों का उपचार तक नहीं किया जाता। उन्हें भगवान की प्रतिष्ठा छोड़ दिया जाता है।

समय पर प्राकृतिक उपचार न होने के कारण वे गंभीर गेहूं की चपेट में आ जाते हैं। हमारे वेद-पुराणों में माता-पिता को ईश्वर के समान माना गया है। आज भी इसी ईश्वर के समान माता-पिता का साथ दिया जा रहा है। लोग भूल जाते हैं कि वे भी बूढ़े हो गए हैं। आज जो व्यवहार वे अपने माता-पिता के साथ कर रहे हैं, जिसका व्यवहार उनके बच्चे उनके साथ कर सकते हैं, क्योंकि वे अपने बच्चे को जैसा संस्कार देंगे, वे वैसा ही व्यवहार करेंगे। समाज को अपने माता-पिता के साथ सभी बुजुर्गों को सम्मान देना चाहिए और अपने बच्चों को भी इसकी शिक्षा देनी चाहिए। इस प्रकार हम एक बेहतर समाज का निर्माण कर पाएंगे।

लेखक-

(माखनलाल चौधरी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल में सहायक सहायक है)

  • लेखक के बारे में

    वर्तमान में नईदुनिया डॉट कॉम में शेयरधारक हैं। पत्रकारिता में अलग-अलग नामांकन में 21 साल का दीर्घ अनुभव। वर्ष 2002 से प्रिंट और डिजिटल में कई बड़े दिन सिद्धांत


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