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जयती विशेष: काशी की यादों के बिस्मिल्लाह… बोले थे, अमेरिका में कैसे लाएंगे बनारस के मंदिरों के घंटों की आवाज और गंगा

अमेरिका में रहने का ठुकराया ऑफर, भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की जयंती पर विशेष

उस्ताद बिस्मिल्लाह खां
-फोटो: सोशल मीडिया

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शहनाई के बादशाह भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ने बनारस को जिया है। गंगा जमुनी तहसीब को समग्र कर जीवन को एकाकार किया। जो शनैः शनैः मांगलिक कार्यक्रम तक था, उसे दुनिया के फलक पर भरोसा था। ऐसे विशेषज्ञ की जिंदगी के बारे में बिस्मिल्लाह खान और बनारस की राय: द साइट ऑफ बनारस बुक में कलमबद्ध करने वाली संगीतकार, संगीतकार और लेखिका पद्मश्री प्रो. रीता सलेम ने उस्ताद से जुड़े पांच किस्से सुनाए।

क्या लाएंगे बनारस के चित्र के घंटे की आवाज और गंगा

जब अमेरिका उस्ताद की शहनाई की मुरीद हो गई तब वहां के राजदूत ने उस्ताद को अमेरिका में रहने की चाहत की। अमेरिका में ही हर वो चीज़ बताई जाती है, जो बिस्मिल्लाह खांचा चाहते थे। तब उस्ताद ने कहा था कि आप बनारस के पितरों के घंटों की आवाज और अविरल प्रवाहित होती गंगा की धारा को ला सकते हैं। तब राजदूत ने कहा कि यह संभव नहीं है…। और इस तरह बिस्मिल्लाह खां ने अमेरिका के आगे काशी को चुना।

दरवाजा खुला द हमके उतर के हो…

प्रो. रीता सलेम उस्ताद को पहली बार विदेश (इंग्लैंड के एडिनवर्ग म्यूजिक फेस्टिवल) लेकर गईं। तब उस्ताद ने जहाज़ में बोला, हमके किरदार उभरे। ठीक है ना लगत हो…, दरवाजा खोल दे हमके प्रवेश के हो। उनके साथ अध्यवसायी कलाकार उस्ताद विलायत खां, पं. केलूचरण महापात्र आदि कलाकार भी थे।


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